इश्क़, मोहब्बत, दोस्ती , अय्याशी , सब हो गई दर किनार,
प्रकृति ने जब नाराजगी में लगाई कोरॉना की ऐसी मार।
पहले प्रेम से मिलना जुलना कहलाता था हमारा अच्छा संस्कार,
अब तो कुण्डी मार k बैठो घर में भैया,
वरना बाहर हो जाएगा तिरस्कार।
अब तो अपनों से ही मिलने में लगता है काफी डर ,
अब क्या करेंगे जनाब ,
महामारी ने अपना कहर बरपाया ही है इस कदर।
लेकिन हिम्मत नहीं हारेंगे हम,
संयम को शास्त्र बनाएंगे,
कोरोणा के सामने हम यूं ही थोड़ी ना हार जाएंगे।
जिस्म की जिस्म से उचित दूरी बनाएंगे,
पर दिल का रिश्ता मजबूत कर के हम अब नए दौर में आएंगे।
ना रुके थे कल ,
ना रुके हैं आज,
ना रुकेंगे आनेवाले कल,
Corona पर विजय पा कर विजयशंक हम बजाएंगे।
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